SACREDFIG

Saturday Poem: बनारस by Kedarnath Singh

In Poetry on July 26, 2009 at 5:22 pm

Dashashwamedh_99 (Early morning at Dashashwamedh Ghat, Benares, Jan 2003)

pt_sep3Writing poems specifically for an occasion, an historical event or place is a tremendous challenge all by itself, but to attempt a poem on a city like Benares, is to invite outright failure. Any description of this vast, ancient, holy city (there ! I’ve said it) can only begin by a descent into a mire of cliches. It is unimaginable that any poem on this city will not have the word “ghat” in it, and yet, it’s impossible to come up with a more cliched association to this city! This predicament is simply inescapable.

And though Kedarnath Singh’s, “Benares” fails – very early, infact, the use of महान पुराने शहर is so irksome precisely because it is so unnecessary – it does begin to get inside the skin of the city as it progresses. The many rythms in the poem feed off the polyrythms of the city itself, from the early invocation of धूल का एक बवंडर, to madhya-laya of “शाम धीरे-धीरे होती है” and finally the eternal stillness of, “कि वहीं पर बँधी है नाँव/ कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ/ सैकड़ों बरस से”. There is perhaps no other way to poeticise this city, but to grapple with the many rythms, sounds, sights and smells and, – here is the difference – the mysterious way in which they all merge into one singularity, a coalescence of truth and beauty, to make Benares what it is.  All of this is enveloped in an extreme unselfconsciousness in the city, that is captured so beautifully in the closing lines, “अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर/ अपनी दूसरी टाँग से/ बिलकुल बेखबर!” And yet no poem can truly convey the totality of essence of this city –  not because we reach the limits of language in such a monumental exercise, but rather because what the city offers is at the very limits of what can be experienced.

pt_sep3बनारस

इस शहर में वसंत
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है

जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्‍वमेध पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्‍थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढि़यों पर बैठे बंदरों की आँखों में
एक अजीब सी नमी है
और एक अजीब सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटरों का निचाट खालीपन

तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ़

इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घनटे
शाम धीरे-धीरे होती है

यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज़ जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बँधी है नाँव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकड़ों बरस से

कभी सई-साँझ
बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में
इसे अचानक देखो
अद्भुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है

आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्‍यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं भी है

जो है वह खड़ा है
बिना किसी स्‍थंभ के
जो नहीं है उसे थामें है
राख और रोशनी के ऊँचे ऊँचे स्‍थंभ (स्तम्भ)
आग के स्तम्भ
और पानी के स्तम्भ
धुऍं के
खुशबू के
आदमी के उठे हुए हाथों के स्तम्भ

किसी अलक्षित सूर्य को
देता हुआ अर्घ्‍य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टाँग से
बिलकुल बेखबर!

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  1. केदारनाथ सिंह की यह कविता परिवेश को चित्रित करने में समर्थ है. वर्तनी की ओर ध्यान दें. स्तम्भ शब्द को अवश्य ठीक कर लें.
    कृष्णमोहन मिश्र

    • मिश्र जी, ग़लतियों के बारे में सूचित करने के लिए आपका धन्यवाद. आपके संकेतानुसार ‘स्‍थंभ’ शब्द को हटा कर ‘स्तम्भ’ का प्रयोग किया गया है. यदि आपको इस ब्लॉग पर और कोई भाषा संबंधी त्रुटि का बोध हो तो अवश्य बताइएगा. -प्रद्युम्न

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