SACREDFIG

Saturday Poem: दिनचर्या by Shrikant Verma

In Poetry on May 30, 2009 at 3:51 pm

dincharya

दिनचर्या

एक अदृश्य टाइपराइटर पर साफ सुथरे
कागज़-सा
चढ़ता हुआ दिन,
तेज़ी से छपते मकान,
घर, मनुष्य

और पूछ हिला
गली के बाहर आता
कोई कुत्ता |

एक टाइपराइटर पृथ्वी पर
रोज़-रोज़
छापता है,
दिल्ली, बम्बई, कलकत्ता |

कहीं पर एक पेड़
अकस्मात छप,
करता है सारा दिन
स्याही में
न घुलने का तप |

कहीं पर एक स्त्री
अकस्मात उभर
करती है प्रार्थना
हे ईश्वर! हे ईश्वर!
ढले मत उमर |

बस के अड्डे पर
एक चाय की दुकान,
टूटी हुई बेंच पर
बैठा है
उल्लू का पट्टा
पहलवान |

जलाशय पर अचानक छप जाता है
मछुए का जाल
चर्कट के कोठे से
उतरती है धूप
और चढ़ता है
दलाल |

एक चिड़चिड़ा बूढ़ा थका कलर्क ऊब कर छपे हुए शहर को,
छोड़ चला जाता है |

Advertisements
  1. Thanks for the Shrikant Verma poems!They remind me of the kind of work my uncle used to write.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: