SACREDFIG

Two poems by Shrikant Verma

In Poetry on May 9, 2009 at 4:12 pm

नगर-वधू

युद्ध के बाद एक-एक शव के सिरहाने
बैठी है शान्ति,
सभी शान्ति-प्रिय थे|

एक और ढंग

भागकर अकेलेपन से
तुम में, मैं गया |
सुविधा के कई वर्ष
तुममें व्यतीत किए
कैसे ?
कुछ स्मरण नहीं |

मैं और तुम ! अपनी दिनचर्या के
पृष्ठ पर
अंकित थे
एक संयुक्ताक्षर !

क्या कहूँ ! लिपि की नियती
केवल लिपि की नियती
थी –
तुममें से होकर भी
बसकर भी,
संग-संग रहकर भी.
बिल्कुल असंग हूँ |

सच है तुम्हारे बिना जीवन अपंग है |
– लेकिन क्यों लगता है मुझे
प्रेम
अकेले होने का ही
एक और ढंग है |

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: